लगभग सात-आठ साल का हूँगा मैं, माँ,
हमारे आँगन में सहजन के पेड़ के नीचे
चीटियाँ जब कतार बना कर चला करतीं,
तो मुझे शैतानी सूझा करती। उनकी कतार
के बीच में मैं थोड़ी सी अपनी थूक से कहीं
एक लाइन खींच देता, चीटियाँ सब कि
सब घबरा सी जातीं और मुझे बड़ा मज़ा
आता उनको ऐसे बिखरते हुए देख कर।
फिर एक दिन आँगन में यही सब नाटक
करने के बाद, मैं घर अन्दर आया और
सीधा आपके कमरे में। आप और पापा
दोनों टी-वी पर आखें जमायें, बड़े शौक
से कुछ देख रहे थे। वी-सी-आर में कैसेट
और स्क्रीन पर एक मस्जिद के तोड़े जाने
के कुछ जोशीले सीन। हज़ारों लोग एक
गुंबद पर धमा-धम, धमा-धम लगे हुए।
पापा आप से बोले 'जल्दी देख लो, द्विवेदी
जी के यहाँ से कैसेट आया है, और अब
शर्मा जी के यहाँ जाना है।' मैं तो थोड़ी
देर देख कर बोर हो गया, मुझे क्या पता
था कि हमारी कालोनी में ये कैसेट एक
घर से दुसरे घर सैर कर रहा है, कितने
मज़े से सारे अफसर लाइन लगाये बैठे हैं
कि कब देखने को मिले। तब कुछ अक्ल
होती, माँ, तो थोड़ी थूक इस कतार के लिए
भी बचाए रखता, तब कुछ अक्ल होती तो
ये समझने कि कोशिश करता कि क्यूं सब
के सब बन गए थे चीटियाँ, क्यूँ हड़बड़ाये से,
अंधे, टूट पड़े थे, क्यूं अफसर लोग अपने
घरों में कैसेट बाँट-बाँट जोश से फूट पड़े थे।
(एम् ऍफ़ हुसैन के लिए, हर एक निर्वासित कलाकार के लिए)