Sunday, July 26, 2009

देखो

अपनी तस्वीर बनाने वाले से हुनर न मांगो, उसका तस्सव्वुर तो देखो,
छिपाने वाले से उसका राज़ न मांगो, उसकी आबरू तो देखो।
अगर प्यार वक़्त के चलने का लंबा सफर है,
तो घड़ियों के रुकने की आरज़ू तो देखो।
कितना कहा, कब तक कहा, लब्ज़ों के पीछे आंखों से, पर
जो आंखों के भी पीछे छुपी है, वो आधी-अधूरी गुफ्तगू तो देखो।
अगर मेरी बातों से हो परेशां, नापसंद है वो, तो उनको
अनसुना करो, पर मेरी बातें करने की जुस्तजू तो देखो।
जिस्म को सांस ज़रूरी है, तारों को रात ज़रूरी है, तो फिर क्यूं साँसे रुकी हैं,
दिन में तारे दिखे हैं, अखिल, इश्क के नक्शे में, क्या ज़रूरी क्या फालतू तो देखो।

Wednesday, July 22, 2009

ऐसी रातें भी बीती हैं _ मोहम्मद दीन तसीर

ऐसी रातें भी बीती हैं
जब तुम्हारी याद नहीं आई,
कुछ दर्द तो हुआ
पर कोई शिकायत नहीं।

हर गलती अब सामने आती है
काले पत्थरों की लकीर बनाये,
कोई आरज़ू नहीं है इन पत्थरों को तोड़ने की,
ना आज़ादी की, ना यहाँ से चल पड़ने की।

ऐसी रातें भी बीती हैं
जब तुम्हारे रास्तों में, हर तरफ़
बस परछाईयां ही परछाईयां थीं,
कूदती ऊपर से नीचे, नीचे से ऊपर
तुम नहीं थे, पर परछाईयां थीं तुम्हारे जैसी
नाचती हुईं,
मैं नहीं था,
पर परछाईयां थीं मेरे जैसी
कांपती हुईं,
हमारे रास्तों की परछाईयां।

ऐसी रातें भी बीती हैं,
जब तुम्हारी याद नहीं आई।


translated into Hindi from Anisur Rahman's Eng tr. 'Shadows' of Mohammad Deen Taseer's Urdu poem.

Wednesday, July 1, 2009

एक बार

सोचते हो हम तुमको भूले बैठें हैं, न नाखुश हैं, न बेकरार, क्या मालूम तुम्हें,
तुम्हारे दरवाज़े से कितनी दफा लौटें हैं दस्तक दिए, तुमने न खोला एक बार।
कितनी बार झिझकते हो, बिल्कुल रोने को आ पड़ते हो, पर मानते नहीं हो हार,
अगर
तुम हमसे करते दिल की बात सामने से हस कर, क्या पता जीत जाते एक बार।