Friday, August 27, 2010

कैसे

यहाँ हर दिल में है दोज़ख की आग, उसको बुझायें कैसे,
ज़मीन की इस जन्नत को फिर से जन्नत बनाएं कैसे।

पत्थर कश्मीर कि सड़कों पर गिर कर भी घिसते नहीं,
हिन्दुस्तां हर पत्थर से आज़ादी का नाम मिटाये कैसे।

चाहते तो ये हैं कि बदल दें जो खुदा ने तकदीर में लिखा,
पर उसके कागज़ पर उसका हि दस्तख़त हम बनाएं कैसे।

ऐ तेहरीक के अजनबी, जो लब्ज़ लिखे थे तुम्हारी शहादत
के पहले, अब हर उस कसीदे को मर्सिया हम बनाएं कैसे।

फुरसत हो, ऐ नबी, तो फिर से आना हमारी दुनिया में,
ये न सोचना कि इतना होने के बाद अब हम जाएँ कैसे।

ख़त तो तुम लिखने बैठे, अखिल, पर इस वतन में डाकखाने
हि नहीं, अब अपना पैगाम उस मुल्क तक पहुँचवायें कैसे।

(आग़ा शाहिद अली के लिए)

Saturday, August 7, 2010

अब आयें हैं


अब आयें हैं फिर पहली तरह मुस्कुराने के दिन,
आँखें चुरा, सांसें दबा, कुछ न कह पाने के दिन,
तुम्हारे बाद, सोचा न था, इतनी जल्द मेरे दर पर
आ जायेंगें, चख कर प्यार, फिर से आज़माने के दिन।
हुईं हैं कॉलेज में मेरे अब फिर से वही कारावाहियाँ शुरू,
छु कर रह जाने के खेल कर रहीं हैं ये कलाईयाँ शुरू,
बेढंगी बातें करने का अब जो जी फिर से करने लगा,
तो उसके बोले ही फिर उड़ने को होती हैं मेरी हवाईयां शुरू।
अब फिर किताबों में मन नहीं, काम सब टलने को है,
फिर उस कॉल के इंतज़ार में ये दिन बलदलने को है,
इश्क में हिदायत होती है कि दूसरी दफा संभल कर करें,
तो फिर से मेरा मन क्यों फिसल कर चलने को है।