Tuesday, September 7, 2010

अकेली है

अकेली है खिड़की कि सिल्ली, अकेली बाहर रात ये,
है अकेली बिजलियों से बादलों कि मुलाक़ात ये, अकेले
सुर में गड़गड़ाता है ये सारा आसमां, गड़गड़ा कर
फिर जो होती अकेली वो बरसात ये। इन दरवाज़ों
के खुलने कि चरचराहट वो भी तो अकेली हि है,
उन पर किसी के पैरों कि आहट वों भी तो अकेली
हि है, जा के देखें हमारे दर पर है किसी ने दस्तक दिया,
दरवाज़ों पर ये खटखटाहट वों भी तो अकेली हि है
आग लग जाए कमरे में मेरे, तो हर चीज़ भी अकेली
जले, किताबें झुलस जाएँ तो पन्नों पर हर लकीर भी
अकेली जले, लपटें मुझ तक आ कर हि भला युं रुक क्यों
जातीं हैं, क्या चाहती हैं कि मेरी ये तकदीर भी अकेली जले

Friday, September 3, 2010

After

After those wasted motel-rooms, after
photographs of dusky skylines, after
room-windows that open at traffic-lights
and riversides all soaked up in a sponge,
there, after gravity, we give us another
chance, hang out, doubt ourselves, lose
step, dance. Before wide eyed closeups
signal impending disaster, before the
feelings consume obsolete men, before
tomorrow when lotuses burn and love
reaches Last Star Ave., the universe is
rent, you and I wait, touch, doubt, end.