Tuesday, June 28, 2011

I do not know

I do not know
when I thought
of you last, but
these few months
not a single day
has passed, an'
these few months,
each time I tried
to forget, tried to
do away with your
part, I had to brush
aside the fact that
I knew you by heart.

Sunday, June 26, 2011

वक़्त ये दिखाया है उसने

वक़्त ये दिखाया है उसने 
तो वक़्त और भी दिखाएगा 
जो बुरा सा है आज कल 
तो वक़्त अच्छा भी आएगा
जो बादल हैं सर पर 
तो बारिश तो होगी 
बरस लेने दो इनको
फिर सूरज आएगा

Tuesday, June 7, 2011

लखनऊ, दिसंबर, उन्नीस सौ बयानवे

लगभग सात-आठ साल का हूँगा मैं, माँ,
हमारे आँगन में सहजन के पेड़ के नीचे
चीटियाँ जब कतार बना कर चला करतीं,
तो मुझे शैतानी सूझा करती। उनकी कतार
के बीच में मैं थोड़ी सी अपनी थूक से कहीं
एक लाइन खींच देता, चीटियाँ सब कि
सब घबरा सी जातीं और मुझे बड़ा मज़ा
आता उनको ऐसे बिखरते हुए देख कर
फिर एक दिन आँगन में यही सब नाटक
करने के बाद, मैं घर अन्दर आया और
सीधा आपके कमरे में। आप और पापा
दोनों टी-वी पर आखें जमायें, बड़े शौक
से कुछ देख रहे थे। वी-सी-आर में कैसेट
और स्क्रीन पर एक मस्जिद के तोड़े जाने
के कुछ जोशीले सीन। हज़ारों लोग एक
गुंबद पर धमा-धम, धमा-धम लगे हुए
पापा आप से बोले 'जल्दी देख लो, द्विवेदी
जी के यहाँ से कैसेट आया है, और अब
शर्मा जी के यहाँ जाना है' मैं तो थोड़ी
देर देख कर बोर हो गया, मुझे क्या पता
था कि हमारी कालोनी में ये कैसेट एक
घर से दुसरे घर सैर कर रहा है, कितने
मज़े से सारे अफसर लाइन लगाये बैठे हैं
कि कब देखने को मिले। तब कुछ अक्ल
होती, माँ, तो थोड़ी थूक इस कतार के लिए
भी बचाए रखता, तब कुछ अक्ल होती तो
ये समझने कि कोशिश करता कि क्यूं सब
के सब बन गए थे चीटियाँ, क्यूँ हड़बड़ाये से,
अंधे, टूट पड़े थे, क्यूं अफसर लोग अपने
घरों में कैसेट बाँट-बाँट जोश से फूट पड़े थे

(एम् ऍफ़ हुसैन के लिए, हर एक निर्वासित कलाकार के लिए)

Friday, June 3, 2011

जो मैं मन को जानन लगी

जो मैं मन को जानन लगी, तो जान नहीं पायी रे
मन हि मसीहा मोरा, मन हि कसाई रे
जो अब तक करती रही मैं अपनी हि मन-मानी
युं अपनी करते करते ये मैं कहाँ चली आई रे