Saturday, September 24, 2011

Back from the library having read Donne

'If it makes you feel any better,' I said,               
'write him a letter.' 'And what is that,'              
Tim asked, 'supposed to achieve,'              
struck by this, bookishly, I quoted Donne,              
'Why, for one, men are sponges, which,           
to pour out, receive, first you send him              
some words, and then he'll send back...'              
'...words,' Tim frowned, 'should I shove 'em              
in your crack, when all I want is his kiss,'              
but I, presently high on Donne, jump at              
exactly this, and say 'see, Tim, more              
than kisses, letters mingle souls,' Tim              
rolls his eyes, as if least concerned              
with the mingling of souls, 'then Akhil,'              
he says, 'if this be true, just tell me              
this, why do all letters ask for a kiss?'

Thursday, September 1, 2011

क्यूँ है

कितना है बदनसीब “ज़फ़र″ दफ़्न के लिए
दो गज़ ज़मीन भी न मिली कू-ए-यार में - बहादुर शाह ज़फ़र (1775-1862)

जो तू कर पाए ना, ऐ खुदा, वो तेरा काम क्यूँ है,
तुझसे होता नहीं रहम तो रहीम तेरा नाम क्यूँ है

तुम जब गए थे मेरे घर से, सब कुछ ले के गए थे,
फिर आज कल इन कमरों में तेरा सामान क्यूँ है


बड़ी महंगी पड़ी ये नज़र, जो तुमने देखा हमको,
ये तो बता कि तेरे हर तोहफे का कोई दाम क्यूँ है
 

जब बात एक, साज़ एक, कलाम एक, आवाम एक,
सरहद आइना हो, तो हिंदुस्तान-पाकिस्तान क्यूँ है

ज़फ़र, तस्सल्ली रख, यार तो सिर्फ दिल में रहता है,
फिर मानो तो रंगून भी दिल्ली है, तू परेशान क्यूँ है
 

बातों-बातों में हि, अखिल, तुम सर दुखाये थे अपना,
तो उससे फिर से बातें करने का ये अरमान क्यूँ है