Sunday, October 23, 2011

क्या से क्या हो जाए

तुम्हें देखे कोई तो क्या से क्या हो जाए,
इक नज़र पड़े और सुन्नी शिया हो जाए


डर डर के खोलते हैं अब अपना फेसबुक का पेज,
कहीं तुम फिर दिखो और कोई वाक्या हो जाए


आज रात किसको अपनी आखों में बांधे रखे हो,
कभी मूँद लेना उनको कि वो भी रिहा हो जाये


ये आठवां महिना बीतता हि नहीं, साल होने को
आया, हम तो चाहते हैं कि महिना नवां हो जाए


इश्क़ के बाद भी तो इश्क़ ज़रूर होता होगा,
देखे चलो, अखिल, कब कौन ज़रिया हो जाए