Saturday, August 25, 2012

Every evening: A song

tr. from Neeraj Singh's Hindi song 'अम्बर पे'

Every evening, I find your footprints on the sky,
and on my windowpane,
with dew drops, someone writes your name.

Do not play with me, for I am yours,
and this heart only beats to ask of you
if you are here, my love, is it true?

Every evening, I find your footprints on the sky,
and on my windowpane,
with dew drops, someone writes your name.

The song of love is written on the sand,
come hear it in the waves sometime,
and come an' pick one evening,
these shells by the sea, they
hide in them heartbeats of mine.

Only when you will come, will I sing
when you will bring the rhythm with you,
then, I will go, for good,
but only once this dream is true.

My heart only beats to ask of you
if you are here, my love, is it true?

Every evening, I find your footprints on the sky,
and on my windowpane,
with dew drops, someone writes your name.

And at night, no matter how much one tries,
they close only when I tie anklets to my eyes,
and straw by straw, this night is grounded,
till all my senses are confounded.

Only when you will come, will I sing
when you will bring the rhythm with you,
then, I will go, for good,
but only once this dream is true.

My heart only beats to ask of you
if you are here, my love, tell me true.

Every evening, I find your footprints on the sky,
and on my windowpane,
with dew drops, someone writes your name.

Thursday, August 23, 2012

शुक्रिया कहना था - विस्लावा ज़िम्बोर्सका

translated from the Joanna Maria Trzeciak's English tr. 'A thank you note' of Wislawa Szymborska's Polish poem



जिनसे इश्क़ नहीं है
उनकी भी कर्ज़दार हूँ मैं

ये जान के राहत है
कि किसी और के ज़्यादा करीब हैं वो

ख़ुशी है कि
न वो 
भेड़ हैं और न मैं भेड़िया  
       

उनके संग चैन है
क्यूंकि उनके संग मैं आज़ाद हूँ
और ये आज़ादी, ना इश्क़ को देनी आती है
ना हि लेनी

मैं उनका खिड़की से दरवाज़े 

तक आने का इंतज़ार नहीं किया करती
मानो किसी सन-डाइल जितना
धैर्य लिए
वो समझ लेती हूँ
जो कभी इश्क़ नहीं समझ पाता
वो सब माफ़ कर देती हूँ
जो इश्क़ कभी माफ़ नहीं कर सकता

उनसे मुलाकात और पैगाम के बीच
मानो कोई अरसा नहीं बीतता,
सिर्फ कुछ दिन या हफ्ते बीतते हैं

उनके साथ सैर पर जाती हूँ तो अच्छा समय बीतता है
कॉन्सर्ट सुने जाते हैं
कथीड्रल देखे जाते हैं 
सारे परिदृश्य अलग अलग नज़र आतें हैं

और जब हमारे बीच
सात-सात नदियाँ और पहाड़ आ जाते हैं
तो वो सात नदियाँ और पहाड़
किसी भी नक़्शे पर पाए जाने वाले होते हैं

उन्हीं के बदौलत
मैं एक तीन आयामी दुनिया में रहती हूँ
कविता के बाहर, शब्दों के बाहर वाली जगह में
और क्षितिज अस्थिर रहता है, क्यूंकि ये असल वाला क्षितिज है

उनको पता तक नहीं
के वो अपने खाली हाथों में क्या-क्या थामें हुए हैं

'मैं उनका कर्ज़दार बिलकुल नहीं'
इश्क़ ने कहा होता  
अगर उससे कोई पूछता


(Thanks to Nishat Haider)



Wislawa Szymborska

Sunday, August 19, 2012

ओ धूल से भूरे

धूल से भूरे
ओ धूल से भूरे
ज़रा पास तो आ
ये हाथ तो दे
इस जलते दिन को
रात तो दे
मैं बैट करूं, क्यूँ
तो गेंद तो दे, हाँ
अपनी सी भूरी मिटटी में
ये हाथ हरामी सेंद तो दे, हाँ
ओ धूल से भूरे

तेरी भूरी कमर
जैसे पेड़ का धड़
उस पेड़ पर जैसे
मैना सा भूरा
तेरा गट्ठा सीना
इस सीने पर हाय
युं खूब पसीना,
पसीने का आज
कुछ टेस्ट तो दे
युं बह जायेगा
क्यूँ वेस्ट करे
ओ धूल से भूरे

मेट्रो ट्रेन हिले
मेटल बार पकड़
थाम के उसको
युं हाथ रगड़
तेरा भूरा कन्धा
तेरी भूरी कोहनी
देख के मुझको
मेरी कर दे बोनी
युं भर दे पूरा
मेट्रो का कोच
तेरी भूरी निगाह
तेरी भूरी सोच,
अब आह भरे क्यूँ
रोज रोज
आ कर दे मेरे 
ये अरमां पुरे
ओ धुल से भूरे