Wednesday, September 11, 2013

स्टेडियम में

tr. from Joan Jara's English tr. of Victor Jara's Spanish song 'Estadio Chile'

Soon after the U.S.A. backed Chilean coup on 9/11 (1973), that overthrew the elected President Allende, singer-poet Victor Jara was imprisoned, with thousands of others, in the Chile Stadium. In the following days, the military tortured and killed many in the stadium. Jara was beaten, his hands and ribs were broken and 44 bullets pumped into his body. Before his murder, Jara wrote 'Estadio Chile' on a piece of paper that was then hidden inside a friend's shoe and smuggled out.

अभी हम पांच हजार हैं
शहर के इस छोटे हिस्से में,

यहाँ तो पांच हजार -
पर मैं सोच ही सकता हूँ
कि हम जैसे और कितने हैं
और शहरों में

अकेले इसी जगह
कम से कम दस हजार हाथ हैं
जो बीज बो सकते हैं,
जो कारखाने चला सकते हैं

पर आज इंसान को यहाँ जूंझने के लिए छोड़ दिया है -
भूख से, ठण्ड से, दहशत, दर्द, हौसलों के टूटने से, आतंक
पागलपन से

हम में से छे तो खो हि गए
जैसे आकाश के सितारों में से -
एक मारा गया
दूसरा ऐसे पीटा गया, कि मैं सोच भी नहीं सकता था किसी इंसान को ऐसा पीटा जा सकता है
बाकी चार अपने डर को मिटाते-मिटाते -
एक कूद गया शुन्य में
दूसरा दीवार पर अपना सर पटके जा रहा है
लेकिन सबमें, इन सबमें, मुझे मौत का निश्चित रूप दिख रहा है

देखो कैसी दहशत पैदा करते हैं तानाशाह 
चाकू-जैसी धार लिए, वो अपने इरादे पूरे करते हैं, 
उनके लिए कुछ मायने नहीं रखता     
उनके लिए लहू ही पदक है
मारना ही वीरता है

क्या यही जग बनाया था तुमने?
क्या इसी के लिए था तुम्हारे सात दिन का वो सब काम, वो सारा विस्मय?

अभी इस चार दिवारी में
हम सब बस एक संख्या बन कर रह गए हैं,
एक संख्या जो अब बढ़ नहीं सकती
केवल उसकी मौत की लालसा धीरे-धीरे बढ़ रही है

लेकिन फिर एकदम से
मेरी रूह जाग उठती है और मुझे दिख पड़ता है
के हत्या के इस भारी ज्वार में कोई धड़कन नहीं है
केवल मशीनों सा स्पंद है  
और मिलिटरी कितनी मधुरता से हस रही है, 
इन्तिज़ार कर रही है

मेक्सिको, क्यूबा, पुरे विश्व -
इस क्रूरता के खिलाफ आवाज़ बुलंद करो
यहाँ दस हजार हाथ हैं जो अब कुछ नहीं उगाते
हम जैसे कितने होंगें इस पुरे देश में

हमारे लीडर, हमारे कौमरेड का ये लहू
अब बम और मशीन-गनों से ज़्यादा चोट पहुंचाएगा,
इस लहू में रंगी हमारी मुट्ठी फिर जुटेगी, फिर बोलेगी हमला

गाना कितना मुश्किल होता है दहशत का गीत
दहशत, जिसमें मैं अब रह रहा हूँ
जिसमें मैं अब मर रहा हूँ,
अपने को इस तरह देख,
यहाँ इन अनगिनत लम्हों में
मेरा गीत सिर्फ इक खामोशी है, सिर्फ इक चीख है

जो मैं अब देख रहा हूँ वो आज तक नहीं देखा
जो मुझे एहसास था
जो एहसास अब हो रहा है
वही जन्म देगा एक ऐसे समय को…


Victor Jara (1932-1973)



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