Tuesday, September 24, 2013

धीरे धीरे

गाते व़क्त बेगम अख़्तर पत्ती लगाती थीं धीरे धीरे,
गोया ओस को छान-छान चांदी बनाती थीं धीरे धीरे।

आवाज़ ऐसी, मेरी मानो, ख़ुदा किसी को भी ना दे,
अल्फ़ाज़ संग, अख़्तरी, खुद को गलाती थीं धीरे धीरे।

चाँद जलता था जब भी जाता था वो बेगम के कूचे से, 
अपने हीरे की नथ से चाँद को वो जलाती थीं धीरे धीरे।   

इश्क़ में ज़ोर नहीं चलता है किसी की जल्दबाज़ी का, 
तो ग़ालिब को ज़ीने-ज़ीने, अख़्तरी चढ़ाती थीं धीरे-धीरे। 

आग से बहुत खेले, अखिल, फिर जो शाम हो आई, 
उस शाम को भी अख़्तरी यूं सुलगाती थीं धीरे धीरे। 

(अख़्तरी बाई के लिये)