Monday, August 4, 2014

हम जीना सिखाते हैं, सर - रफ़ीफ़ ज़ीयादाह

tr. from Rafeef Ziadah's "We teach life, sir"

आज टीवी पर मेरे जिस्म का कत्लेआम हुआ
आज टीवी पर मेरे जिस्म का कत्लेआम हुआ
उसको फिट होना पड़ा कुछ साउंड-बाइट्स में, शब्द-सीमाओं में,
आज टीवी पर मेरे जिस्म का कत्लेआम हुआ
उसको फिट होना पड़ा कुछ साउंड-बाइट्स में, शब्द-सीमाओं में
आंकड़ों से लैस, उनकी नपी-तुली प्रतिक्रियाओं के खिलाफ,
और मैंने अपनी अंग्रेजी बेहतर करी,
अपने सारे U.N. रेज़ोलूशंस याद किये
लेकिन फिर भी, उसने मुझसे पुछा --
"मिस ज़ीयादाह, क्या आप ये नहीं लगता
की सब कुछ ठीक हो जायेगा, अगर आप सब सिर्फ
अपने बच्चों को इतनी नफरत सिखाना बंद कर दें?"
बस, रुको,
मैं अपने अंदर झांकती हूँ
धैर्य की उस ताकत के लिए
पर धैर्य मेरी जुबां के सिरे पर नहीं है
जब गाज़ा पर बमों की बारिश हो रही हो,
धैर्य मेरे से दूर भागता है,
बस, रुको,
मुस्कुराओ
हम जीना सिखाते हैं, सर
- रफ़ीफ़, याद से मुस्कुराते ज़रूर रहना,
 हम जीना सिखाते हैं, सर
हम फिलिस्तीनी जीना सिखाते हैं, उनके आखिरी आसमान
पर कब्जे करने के बाद भी,
हम जीना सिखाते हैं, उनकी अवैध बस्तियों के निर्माण के बाद,
उनकी अपार्थाइड की दीवारों के बाद, इस आखिरी आसमान के बाद,
हम जीना सिखाते हैं, सर,
लेकिन आज,
आज टीवी पर मेरे जिस्म का कत्लेआम हुआ
उसको फिट होना पड़ा कुछ साउंड-बाइट्स में, शब्द-सीमाओं में, 
- और, हमें बस एक स्टोरी दे दीजिये
एक सिंपल ह्यूमन स्टोरी,
देखिये ये पोलिटिकल नहीं है,
हम लोगों को बस आपके और आपके लोगों के बारे में बताना चाहते हैं,
तो हमें एक मानवीय कहानी दे दीजिये,
इन सब शब्दों का इस्तमाल न करिये - कब्ज़ा, अपार्थाइड,
ये पोलिटिकल नहीं है, देखिये आपको मेरी मदद करनी चाहिए,
एक जर्नलिस्ट की, की मैं आपकी मदद कर सकूँ आपकी कहानी
बयान करने में, वो कहानी जो की पोलिटिकल नहीं है
- आज टीवी पर मेरे जिस्म का कत्लेआम हुआ,
क्यों नहीं एक ऐसी गाज़ा की महिला की कहानी बता देती
जिसको दवायियों की ज़रुरत है, क्यों नहीं,      
क्या आपके पास इतना हाड-मॉस, टूटे हाथ पैर नहीं जो आसमान
में सूरज को ढक सके, अपने मुर्दों को मेरे हवाले कर दीजिये,
मुझे उनके नामों की एक लिस्ट दे दीजिये, पर एक हजार दो सौ शब्द
की सीमा के अंदर - आज टीवी पर मेरे जिस्म का कत्लेआम हुआ
उसको फिट होना पड़ा साउंड-बाइट्स में, शब्द-सीमाओं में,
जिससे उनके भी दिल दहल सकें जो आतंकवादियों के खून की तरफ    
असंवेदनशील हैं, लेकिन जिनको बुरा लगता है गाज़ा की गाय-बकरियों के लिए
तो मैं उनको U.N. रेज़ोलूशंस देती हूँ, उनको आंकड़ें देती हूँ,
की हम निंदा करते हैं, की हम शोक प्रकट करते हैं,
की हम अस्वीकार करते हैं, की ये दोनों पक्ष एक से नहीं हैं
- एक ने कब्ज़ा किया है, एक पर कब्ज़ा हुआ है -
और सौ मारे गए, दो सौ मारे गए, हजार मारे गए,
इस कत्लेआम और युद्ध-अपराधों के बीच, मैं किसी भी तरह
ये सारे शब्द कह देती हूँ, मुस्कुराती रहती हूँ, कोई बाहर की नहीं,
अजीब नहीं, फिर मुस्कुराती हूँ, आतंकवादी नहीं, और उनको
गिनाती हूँ, सौ मारे गए, दो सौ मारे गए, हजार मारे गए,
कोई है वहाँ जो ये सब सुन रहा है 
- मेरी ख्वाइश है की मैं उन मारे गए लोगों के देह पर
रो तो सकूँ, मेरी ख्वाइश है की मैं नंगे पैर रिफ्यूजी कैम्प्स में दौड़ कर
सारे बच्चों के कान अपने हाथों से ढक सकूँ, की वो ज़िन्दगी भर
बमों की आवाज़ न सुनते रहे, जैसे मैं सुनती रहती हूँ,
आज टीवी पर मेरे जिस्म का कत्लेआम हुआ
उसको फिट होना पड़ा कुछ साउंड-बाइट्स में, शब्द-सीमाओं में,
और मैं एक बात कह दूँ, आपके इन U.N. रेज़ोलूशंस ने इसके बारे में
कभी कुछ नहीं किया, और कोई साउंड-बाइट्, कोई साउंड-बाइट्, कोई साउंड-बाइट्
चाहे मेरी अंग्रेजी कितनी बेहतर ही क्यों न हो जाये, कोई साउंड-बाइट्
कोई साउंड-बाइट् इन लोगों को फिर से ज़िंदा नहीं कर सकती,
कोई साउंड-बाइट् इस सब को ठीक नहीं कर सकती,
हम जीना सिखाते हैं, सर
हम जीना सिखाते हैं, सर
हम फिलिस्तीनी, हर सुबह उठ कर, बाकी सारे जहां को
जीना सिखाते हैं,
सर